भीलवाड़ा। पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर भीलवाड़ा स्थित हरिशेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर में आयोजित श्री शिव महापुराण कथा महोत्सव के तृतीय दिवस पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। कथा व्यास एवं प्रख्यात संत डॉ. स्वामी निर्मल दास जी महाराज ने ‘नारद मोह’ और ‘कुबेर चरित्र’ के प्रसंगों का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि अहंकार का त्याग और प्रभु की शरण ही जीवन का सच्चा मार्ग है।
सनातन सेवा समिति, हरिशेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर एवं महामंडलेश्वर स्वामी श्री हंसराम जी उदासीन महाराज के सान्निध्य में आयोजित इस धार्मिक आयोजन में स्वामी निर्मल दास जी महाराज ने बताया कि भगवान की भक्ति मनुष्य को मोह, अहंकार और अज्ञान से मुक्त कर आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर करती है।
नारद मोह प्रसंग से मिली विनम्रता की सीख
कथा के दौरान स्वामी जी ने नारद मोह प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि कठोर तपस्या और साधना से कामदेव को पराजित करने के बाद देवर्षि नारद के मन में सूक्ष्म अहंकार उत्पन्न हो गया था। भगवान विष्णु ने अपने प्रिय भक्त के कल्याण के लिए मायानगरी की रचना की, जहां नारद मोह के बंधन में बंध गए। बाद में जब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ तो उनका अहंकार समाप्त हो गया और उन्होंने प्रभु की शरण ग्रहण की।
उन्होंने कहा कि यह प्रसंग मानव जीवन को सिखाता है कि ज्ञान, पद, शक्ति और तप का अभिमान भी आध्यात्मिक पतन का कारण बन सकता है।
कुबेर चरित्र से मिला भक्ति और समर्पण का संदेश
स्वामी निर्मल दास जी महाराज ने कुबेर के पूर्व जन्म की कथा सुनाते हुए बताया कि भगवान शिव की अनन्य भक्ति और कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें धन के अधिपति एवं देवताओं के कोषाध्यक्ष का पद प्रदान किया।
उन्होंने कहा कि कुबेर की महानता उनके वैभव में नहीं, बल्कि उनकी शिवभक्ति और समर्पण में निहित है। धन और संपत्ति तभी सार्थक हैं जब उनका उपयोग धर्म, सेवा और लोककल्याण के लिए किया जाए।
शिव भक्ति, जप और सत्संग का महत्व बताया
कथावाचन के दौरान स्वामी जी ने श्रद्धालुओं को “ॐ हरये नमः” एवं “ॐ महेश्वराय नमः” मंत्रों के जप का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है, इसलिए समय-समय पर सत्संग, तीर्थयात्रा, जप और तप अवश्य करना चाहिए।
उन्होंने पार्थिव शिवलिंग पूजन की महिमा का वर्णन करते हुए बताया कि शास्त्रों में विभिन्न मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए पार्थिव शिवलिंग निर्माण एवं पूजन का विशेष विधान बताया गया है।
अर्जुन और दुर्योधन के प्रसंग से दिया जीवन प्रबंधन का संदेश
महाभारत के प्रसंग का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने कहा कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन और दुर्योधन को विकल्प दिया तो दुर्योधन ने विशाल सेना को चुना, जबकि अर्जुन ने स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को चुना। यही अर्जुन की मांगने की कला थी कि उन्होंने संपत्ति नहीं, बल्कि परमात्मा को चुना।
उन्होंने कहा कि जब भगवान का साथ मिलता है तो जीवन की सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं और सफलता स्वतः प्राप्त होती है।
भक्ति रस में डूबे श्रद्धालु, गूंजा ‘ॐ नमः शिवाय’
कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भगवान शिव की स्तुति एवं भजनों का सामूहिक गायन किया। “ब्रह्मा मुरारी सुरार्चित लिंगम्” और “पकड़ लो बाँह रघुराई, नहीं तो डूब जाएंगे” जैसे भजनों ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
भजन संध्या के दौरान श्रद्धालु भक्ति रस में झूम उठे और पूरा पंडाल “ॐ नमः शिवाय” तथा “जय भोले” के जयघोष से गूंज उठा।
गंगा आरती, दुर्गा सप्तशती पाठ और अखंड रामधुन का आयोजन
कथा के उपरांत श्रद्धालुओं ने भगवान शिव की आरती में सहभागिता कर पूजन-अर्चन किया। इसके बाद प्रसाद वितरण किया गया।
आश्रम के संत मायाराम जी एवं गोविंदराम जी ने बताया कि पुरुषोत्तम मास के दौरान प्रतिदिन सायंकाल काशी की तर्ज पर भव्य गंगा आरती, दुर्गा सप्तशती पाठ और अखंड रामधुन का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं से अधिकाधिक संख्या में धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेने का आह्वान किया।
