हरि शेवा उदासीन आश्रम में सतगुरु बाबा शेवाराम साहेब जी का मासिक जन्म उत्सव श्रद्धापूर्वक मनाया

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भीलवाड़ा, 26 सितंबर। हरि शेवा उदासीन आश्रम में सतगुरु बाबा शेवाराम साहेब जी का मासिक जन्म उत्सव श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर आश्रम परिसर में विशेष सत्संग का आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

आश्रम के महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी उदासीन ने सत्संग के माध्यम से श्रद्धालुओं को सतगुरु की महिमा, सेवा, सिमरन और सद्मार्ग पर चलने का संदेश दिया। उन्होंने भक्तिमय वातावरण में ‘‘इंदे ही मुखे सतगुरुन सतनाम चवायो’’ भजन प्रस्तुत किया। भजन के दौरान श्रद्धालु भक्तिरस में डूबे नजर आए।

महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी ने सतगुरु बाबा शेवाराम साहेब जी की महिमा का वर्णन करते हुए उनके स्मरण और उनके बताए मार्ग पर चलने का संदेश दिया। इससे आश्रम परिसर का वातावरण भक्तिमय हो गया।

कार्यक्रम के अंत में आरती एवं अरदास की गई। इसके बाद श्रद्धालुओं ने भंडारा प्रसाद ग्रहण किया। आयोजन में श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और उत्साह के साथ भाग लिया।

इस अवसर पर श्रीमान महंत सत मुनि जी महाराज उत्तर पंगत (पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन), संत अचलेश्वरानंद जी महाराज, संत अरविंद दास जी, आश्रम के संत मायाराम, राजाराम, गोविंदराम, केशवराम, बालक मिहिर सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं ट्रस्टी उपस्थित रहे।

भाद्रपद पूर्णिमा का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व

भाद्रपद पूर्णिमा का हिंदू धर्म में विशेष धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना, तीर्थ स्नान, दान-पुण्य, व्रत तथा भगवान सत्यनारायण की कथा का विशेष विधान बताया गया है।

भाद्रपद पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धालु सत्यनारायण भगवान का व्रत रखते हैं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर कथा का श्रवण करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धापूर्वक सत्यनारायण व्रत एवं कथा करने से परिवार में सुख-समृद्धि, शांति और धन-धान्य की वृद्धि की कामना की जाती है।

इस दिन भगवान शिव एवं माता पार्वती की पूजा-अर्चना का भी महत्व बताया गया है। मान्यता है कि शिव-पार्वती की आराधना से दांपत्य जीवन में सुख-शांति और सौभाग्य की कामना की जाती है।

भाद्रपद पूर्णिमा से पितृपक्ष यानी श्राद्ध पक्ष की शुरुआत भी मानी जाती है। इस अवसर पर लोग अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए तर्पण, दान-पुण्य एवं अन्य धार्मिक कार्य करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किए गए धार्मिक कार्यों से उनका आशीर्वाद प्राप्त होने की कामना की जाती है।

इस प्रकार भाद्रपद पूर्णिमा आस्था, उपासना, दान-पुण्य और पूर्वजों के स्मरण का पर्व है, जिसका धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व माना जाता है।

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