हरि शेवा उदासीन आश्रम में पुरुषोत्तम मास पर शिवमहापुराण कथा की अविरल गंगा

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शिवपुराण के श्रवण मात्र से धर्म, भक्ति और सदाचार की दिशा मिलती है – स्वामी डॉ. निर्मल दास जी महाराज

शिवलिंग की उत्पत्ति एवं ब्रह्मा-विष्णु विवाद का प्रसंग सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु

भीलवाड़ा, 9 जून। सनातन सेवा समिति, हरि शेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर एवं महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी उदासीन महाराज के सान्निध्य में पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर आयोजित श्री शिवमहापुराण कथा महोत्सव के द्वितीय दिवस श्रद्धालुओं ने भक्ति एवं आध्यात्मिक ज्ञान की अमृतवर्षा का लाभ प्राप्त किया।

उदासीन संस्कृत विद्यालय, काशी (उत्तर प्रदेश) के प्रख्यात कथाव्यास स्वामी डॉ. निर्मल दास जी महाराज ने व्यासपीठ से भगवान शिव की महिमा का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि शिवमहापुराण का श्रवण मानव जीवन को धर्म, भक्ति एवं सदाचार के मार्ग पर अग्रसर करता है। उन्होंने कहा कि शिवमहापुराण की कथा का प्रारंभ प्रयागराज स्थित गंगा, यमुना एवं सरस्वती के पावन संगम के माहात्म्य से होता है, जो आध्यात्मिक शुद्धि और ईश्वर प्राप्ति का प्रतीक है।

स्वामी जी ने कहा कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसका सदुपयोग भगवान की भक्ति, सत्संग एवं परोपकार में करना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से आत्मचिंतन का आह्वान करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि शेष जीवन किस प्रकार व्यतीत करना है। परमात्मा की भक्ति ही जीवन का वास्तविक लक्ष्य है।

उन्होंने कहा कि पुरुषोत्तम मास जैसे दुर्लभ एवं पुण्यदायी अवसर का लाभ उठाते हुए मनुष्य को भक्ति एवं सत्संग में स्वयं को समर्पित कर देना चाहिए। संतों का सान्निध्य एवं धर्मग्रंथों का श्रवण ही कलियुग में पुण्य संचय और आत्मकल्याण का श्रेष्ठ साधन है।

कथा के दौरान स्वामी डॉ. निर्मल दास जी महाराज ने शिवलिंग की उत्पत्ति का दिव्य प्रसंग सुनाते हुए बताया कि शिवलिंग परम ब्रह्म के अनंत स्वरूप का प्रतीक है, जिसका न आदि है और न अंत। उन्होंने ब्रह्माजी एवं भगवान विष्णु के मध्य श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद का उल्लेख करते हुए बताया कि जब दोनों देवताओं के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हुई, तब भगवान शिव अनंत ज्योतिर्मय स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। ब्रह्मा और विष्णु उस स्तंभ का आदि और अंत खोजने में असफल रहे, जिससे उन्हें भगवान शिव की परम महिमा का बोध हुआ।

स्वामी जी ने कहा कि भगवान शिव ऐसे आराध्य देव हैं जिनकी पूजा किसी भी जाति, वर्ग, आयु अथवा सामाजिक स्थिति का व्यक्ति कर सकता है। शिवभक्ति सभी के लिए समान रूप से कल्याणकारी है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।

कथा के दौरान प्रस्तुत भजन “शिव भोला भंडारी, शरण हम आए तिहारी…” पर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। “हर-हर महादेव” के जयघोषों से संपूर्ण वातावरण शिवमय हो गया।

स्वामी डॉ. निर्मल दास जी महाराज ने कहा कि शिवपुराण का श्रवण मनुष्य के जीवन को धर्म, भक्ति और सदाचार की दिशा प्रदान करता है। भगवान शिव का स्मरण, नाम-जप और कथा-श्रवण कलियुग की सरल एवं प्रभावशाली साधना है, जिससे अंतःकरण की शुद्धि एवं आत्मिक शांति प्राप्त होती है।

कथा के उपरांत महाआरती का आयोजन हुआ तथा श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण किया गया।

इससे पूर्व प्रातःकालीन श्री विष्णु यज्ञ में कन्हैया मोरयानी, हरीश-निशा आडवाणी, राजा- वर्षा टिक्यानी, रमेश मूंदड़ा एवं हनुमान प्रसाद अग्रवाल ने विश्व शांति एवं जनकल्याण की कामना के साथ आहुतियां अर्पित कीं तथा भगवान महादेव का रुद्राभिषेक किया।

आश्रम के संत मायाराम जी एवं संत गोविन्दराम जी ने बताया कि प्रतिदिन सायंकाल काशी की तर्ज पर भव्य गंगा आरती, दुर्गा सप्तशती पाठ एवं अखंड रामधुन का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं से पुरुषोत्तम मास के दौरान आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में अधिकाधिक संख्या में भाग लेने का आग्रह किया।

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