अखंड भारत संकल्प दिवस पर गूंजा राष्ट्रभक्ति का संदेश, मातृशक्ति से राष्ट्रप्रेमी पीढ़ी निर्माण का आह्वान

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लाडो सेवा फाउंडेशन ने मनाया अखंड भारत संकल्प दिवस, संस्थापक लक्ष्मण सिंह राठौड़ बोले—“माताएं संस्कार दें, तो पीढ़ियां इतिहास रचती हैं”

भीलवाड़ा। लाडो सेवा फाउंडेशन द्वारा अखंड भारत संकल्प दिवस राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रीय एकता, भारतीय संस्कृति और अखंडता के संकल्प के साथ मनाया गया। कार्यक्रम में मातृशक्ति की राष्ट्र निर्माण में भूमिका को केंद्र में रखते हुए आने वाली पीढ़ी में देशभक्ति, संस्कार, त्याग, सेवा और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना विकसित करने का आह्वान किया गया।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए लाडो सेवा फाउंडेशन के संस्थापक अधिवक्ता लक्ष्मण सिंह राठौड़ ने कहा कि भारत का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि जब मातृशक्ति ने अपनी संतति को राष्ट्र और संस्कृति के संस्कार दिए, तब असाधारण व्यक्तित्वों ने जन्म लिया और उन्होंने देश के इतिहास की दिशा बदल दी।

उन्होंने कहा कि माता जीजाबाई ने बाल्यकाल से ही छत्रपति शिवाजी महाराज के मन में राष्ट्रप्रेम, स्वाभिमान, साहस, धर्मनिष्ठा और स्वराज्य की भावना के संस्कार रोपे थे। इन्हीं संस्कारों और प्रेरणा के बल पर शिवाजी महाराज ने विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष किया और स्वराज्य की स्थापना का महान कार्य किया। उनके व्यक्तित्व और संघर्ष ने भारतीय इतिहास में स्वाभिमान और स्वतंत्रता की एक नई चेतना पैदा की।

“मातृशक्ति स्वयं दुर्गा और काली का स्वरूप है”

राठौड़ ने कार्यक्रम में उपस्थित मातृशक्ति की ओर संकेत करते हुए कहा कि “मेरे सामने बैठी मातृशक्ति केवल परिवार की आधारशिला नहीं है, बल्कि वह दुर्गा है, वह काली है, वह शक्ति है जो आने वाली पीढ़ियों का निर्माण कर सकती है।”

उन्होंने कहा कि एक मां अपनी संतान को केवल जन्म ही नहीं देती, बल्कि उसके विचारों, संस्कारों और चरित्र का भी निर्माण करती है। बच्चे के मन में देश के प्रति सम्मान, समाज के प्रति संवेदना और राष्ट्र के प्रति समर्पण की पहली सीख विद्यालय से पहले परिवार से मिलती है।

उन्होंने कहा कि यदि माताएं अपनी संतति को बचपन से ही भारत के गौरवशाली इतिहास, वीरों के त्याग, स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और भारतीय संस्कृति के मूल्यों से परिचित कराएं, तो आने वाली पीढ़ी केवल अपने भविष्य के बारे में नहीं सोचेगी, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के लिए भी जिम्मेदारी महसूस करेगी।

“अखंड भारत का संकल्प केवल भूगोल नहीं, राष्ट्रीय चेतना का संकल्प”

राठौड़ ने कहा कि अखंड भारत का भाव केवल सीमाओं और भूगोल तक सीमित नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक एकता, राष्ट्रीय चेतना, सभ्यता, परंपरा और उस साझा विरासत के प्रति सम्मान का संकल्प है, जिसने हजारों वर्षों से भारतीय समाज को जोड़कर रखा है।

उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि युवा पीढ़ी को भारत के इतिहास और संस्कृति की सही जानकारी दी जाए। राष्ट्र के प्रति प्रेम केवल नारों तक सीमित न रहे, बल्कि वह हमारे आचरण, सेवा, जिम्मेदारी और सामाजिक व्यवहार में दिखाई दे।

उन्होंने कहा कि देश के भविष्य का निर्माण संसद, विधानसभाओं या संस्थानों में ही नहीं होता, बल्कि घर की चारदीवारी में भी होता है। एक मां जिस भावना के साथ अपने बच्चे का पालन-पोषण करती है, वही भावना आगे चलकर समाज और राष्ट्र के चरित्र का हिस्सा बनती है।

“हर घर से निकले राष्ट्रप्रेमी और संस्कारित संतति”

कार्यक्रम में यह संदेश दिया गया कि परिवारों में बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों, अनुशासन, सेवा और राष्ट्रप्रेम के संस्कार भी दिए जाने चाहिए।

राठौड़ ने कहा कि “हमारा संकल्प ऐसा भारत बनाने का होना चाहिए, जहां युवा अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझे, जहां शिक्षा के साथ संस्कार हों, शक्ति के साथ संयम हो और सफलता के साथ समाज एवं राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का भाव हो।”

उन्होंने मातृशक्ति से आह्वान किया कि वे अपनी संतति को केवल सफल व्यक्ति बनाने का लक्ष्य न रखें, बल्कि उन्हें चरित्रवान, संस्कारित, साहसी, संवेदनशील और राष्ट्र के प्रति समर्पित नागरिक बनाने का प्रयास करें।

संकल्प के साथ कार्यक्रम का समापन

कार्यक्रम के दौरान भारत की एकता, अखंडता, संस्कृति और राष्ट्रगौरव के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की गई। उपस्थित मातृशक्ति एवं कार्यकर्ताओं ने संकल्प लिया कि वे अपने परिवारों और समाज में राष्ट्रप्रेम एवं सकारात्मक राष्ट्रीय चेतना के संस्कारों को मजबूत करने का प्रयास करेंगे।

लाडो सेवा फाउंडेशन ने कहा कि संस्था सामाजिक सेवा के साथ-साथ समाज में राष्ट्रभाव, नारी सम्मान, युवा जागरण, संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करने के लिए निरंतर प्रयास करती रहेगी।

कार्यक्रम का संदेश स्पष्ट था—इतिहास केवल पढ़ाया नहीं जाता, संस्कारों से बनाया जाता है और उन संस्कारों की पहली पाठशाला मां की गोद होती है।

“जिस मां की गोद में राष्ट्रभक्ति का बीज पनपता है, उसी घर से भविष्य का शिवाजी जन्म ले सकता है।”

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