पितृ पक्ष में तर्पण और श्राद्ध कर्म से पितरों की तृप्ति का विधान, धर्मग्रंथों में बताए गए हैं अनेक लाभ
भीलवाड़ा। श्राद्ध शब्द ‘श्रद्धा’ से बना है, जिसका अर्थ अपने पितरों के प्रति सच्चे मन से आदर, श्रद्धा और समर्पण भाव रखना है। अपर्णा ज्योतिष कार्यालय लाछुड़ा के आचार्य पंडित योगेश शिक्षा शास्त्री ने बताया कि सामान्यतः प्रत्येक वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक की अवधि को पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष कहा जाता है। इसके अलावा परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु तिथि पर भी प्रतिवर्ष श्राद्ध कर्म किया जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध कर्म के माध्यम से व्यक्ति अपने पितरों का स्मरण करता है और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है। शास्त्रों में इसे पितृ ऋण से मुक्ति का माध्यम भी बताया गया है। महर्षि सुमंतु के अनुसार संसार में श्राद्ध से बढ़कर कोई अन्य कल्याणकारी मार्ग नहीं है, इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करना चाहिए।
धर्मग्रंथों में श्राद्ध की महत्ता
गरुड़ पुराण में पितृ पूजन और श्राद्ध कर्म से प्रसन्न होकर पितरों द्वारा आयु, संतान, यश, कीर्ति, पुष्टि, बल, वैभव, सुख, धन और धान्य प्रदान करने का उल्लेख मिलता है।
मार्कण्डेय पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध से तृप्त होकर पितृगण श्राद्धकर्ता को दीर्घायु, संतान, धन, विद्या, सुख, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करते हैं।
ब्रह्मपुराण में श्रद्धा और भक्ति से किए गए श्राद्ध की महत्ता बताते हुए कहा गया है कि श्रद्धापूर्वक किया गया श्राद्ध कुल के कल्याण का माध्यम बनता है। इसमें पिण्डों पर गिरी जल की बूंदों से पशु-पक्षी योनि में स्थित पितरों के पोषण तथा बाल्यावस्था में दिवंगत हुए पितरों की तृप्ति का भी उल्लेख मिलता है।
कूर्मपुराण में एकाग्रचित होकर विधिपूर्वक श्राद्ध करने को पापों से मुक्ति और मोक्ष का माध्यम बताया गया है। वहीं विष्णु पुराण में कहा गया है कि श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध से केवल पितृगण ही नहीं, बल्कि देवता, ऋषि, मनुष्य, पशु-पक्षी और अन्य प्राणी भी तृप्त होते हैं।
देवलस्मृति में श्राद्ध की इच्छा और उसके पालन को निरोगता, दीर्घायु, योग्य संतान, धन तथा समृद्धि से जोड़ा गया है। अत्रिसंहिता में पुत्र, भाई, पौत्र अथवा दौहित्र द्वारा पितृकार्य में संलग्न रहने की महत्ता बताई गई है। यमस्मृति में देवता, ब्राह्मण, अग्नि और पितरों की पूजा को भगवान विष्णु की पूजा के समान बताया गया है।
पितरों के प्रति कृतज्ञता का भाव
आचार्य पंडित योगेश शिक्षा शास्त्री ने बताया कि श्राद्ध का मूल भाव केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और स्मरण की परंपरा है। शास्त्रों में अलग-अलग प्रकार से श्राद्ध की महत्ता और उससे मिलने वाले आध्यात्मिक एवं धार्मिक फलों का वर्णन किया गया है।
उन्होंने बताया कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक पितरों का तर्पण और अपनी-अपनी परंपरा एवं मृत्युतिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म करने का विधान माना गया है। श्रद्धा और विधि-विधान के साथ किया गया पितृ तर्पण व्यक्ति को अपने पूर्वजों के प्रति कर्तव्य और कृतज्ञता का स्मरण कराता है।
